कुपोषण

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भोपाल स्थित गैर लाभकारी संस्था विकास संवाद ने मध्य प्रदेश के छह जिलों में 45 दिनों तक पोषण आहार का अध्ययन कर "महिलाओं और बच्चों के पोषण पर कोविड-19 महामारी" का प्रभाव नामक एक रिपोर्ट तैयार की है. यह रिपोर्ट कोविड-19 की लहर में हाशिए पर रह रहे और वापसी कर रहे प्रवासी परिवारों की महिलाओं और बच्चों के सामने आने वाली दुविधाओं और परेशानियों के एवज में तैयार की गई है. यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश के 6 जिलों का अध्ययन कर तैयार की गई है: पन्ना, सतना, रीवा, निवाड़ी, उमरिया और शिवपुरी.

इन जिलों के 122 गांवों में महिलाओं और बच्चों के लिए चलने वाले पोषण और स्वास्य्औ कार्यक्रम (आंगनवाडी से मिलने वाले पोषण आहार, टीकाकरण, निगरानी आदि) के संचालन की स्थिति का अध्ययन किया गया. इन्हीं 122 गांवों में से रैंडम पद्ति से 33 परिवारों को चुना गया जिनमें गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, 6 साल से कम उम्र के बच्चे और प्रवासी परिवारों की मिश्रित आबादी में केस स्टडी दर्ज की गयीं. इन 33 परिवारों को चुनने का मकसद यह रहा कि इन परिवारों में लॉकडाउन के दौरान किये जा रहे भोजन में पोषण का स्तर क्या है? इसकी निरंतरता क्या है? जरूरत-उपभोग में कितना अंतर है? ये आंकलन किया जा सके. इसके लिए उनके 45 दिन के पोषण उपभोग का अध्ययन किया गया है. महिलाओं और बच्चों के पोषण पर कोविड-19 महामारी का प्रभाव नामक इस रिपोर्ट (पूरी रिपोर्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.) की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं,

1. जनसंख्या, जनगणना वर्गीकरण और परिवार का आकार: सर्वेक्षण में शामिल 33 घरों की कुल जनसंख्या 179 थी। इन 33 परिवारों में 21 प्रवासी परिवार (64 प्रतिशत) शामिल हैं। कुल 33 परिवारों में 6 गर्भवती महिलाएं, 12 धात्री माताएं, 21 बच्चे (3 वर्ष से कम आयु) और 24 बच्चे (3-6 वर्ष की आयु) शामिल हैं।

2. अधिकांश परिवार (79 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति (जिनमें मवासी, गोंड, कोल और बैगा शामिल हैं) से हैं। शेष 21 प्रतिशत में 12 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग और 9 प्रतिशत अनुसूचित जाति के हैं। सभी मामलों में औसतन पारिवारिक आकार 5.4 का है। 

3. लॉकडाउन के दौरान आय - 33 परिवारों में से 30 (91 प्रतिशत) के पास मजदूरी या श्रमिक के तौर पर रोजगार नहीं है, जबकि 3 परिवार (9 प्रतिशत) परिवार अपवाद रहे। 2 परिवार (6 प्रतिशत) गैर काष्ठ वन उत्पाद (नॉन-टिम्बर फारेस्ट प्रोड्यूस - एनटीएफपी - ) एकत्रित कर रहे हैं जबकि 1 (3 प्रतिशत) किसी और के खेत में कटाई का काम कर रहा है। 

4. कर्ज और उधारी - 8 (24 प्रतिशत) परिवारों पर कुल ₹21,250 का कर्ज है। 4 (12 प्रतिशत) परिवारों पर ₹3000-4000 के बीच कर्ज है और 3 (9 प्रतिशत) परिवारों ने ₹1000 रुपये से भी कम उधार लिया है। एक परिवार ने तो 150 से कम राशि उधार ली है। एक केस में 17,000 से ज्यादा की उधारी की सूचना है। कोविड-19 से इन परिवारों की जिंदगी में जो मुश्किलें खड़ी हुई हैं, उनसे मुकाबला करने और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए अनाज और सब्जियों के साथ-साथ तेल, मसाले और अन्य आवश्यक सामान खरीदने के लिए यह पैसा उधार लिया गया है।

5. टेक होम राशनः स्वयं सहायता समूह/आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा वितरित किए जाने वाले टेक होम राशन (टीएचआर) पैकेट्स 21 (65 प्रतिशत) परिवारों को घर पर मिले, लेकिन शेष 12 (35 प्रतिशत) हितग्राही परिवारों को अब तक कोई पैकेट नहीं मिला है। 12 (38 प्रतिशत) परिवारों को टीएचआर के सिर्फ दो पैकेट मिले हैं। 

6. रेडी टू ईट फूड (आरटीई): 60 प्रतिशत हितग्राहियों को अब तक कोई रेडी टू ईट (आरटीई) नहीं मिला है। जिन्हें अब तक आरटीई मिला है, उनमें महज 10 प्रतिशत को 500 ग्राम सत्तू मिला है जबकि 30 प्रतिशत को 1,200 ग्राम (600 ग्राम दो हफ्ते के लिए) सत्तू मिला है। 

7. स्वयं सहायता समूह और पोषण आहार - कोविड19 के कारण उत्पन्न हुई जटिल परिस्थितियों में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के तहत गरम पके हए पोषण आहार के हितग्राहियों को भी रेडी टू ईट पोषण आहार प्रदान करने के लिए निर्देश जारी किये गए थे. इस आदेश के तहत स्थानीय स्वयं सहायता समूहों को सत्तू या लड्डू चूरा बनाने और आंगनवाड़ी केन्द्रों को उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए गए. किन्तु मैदानी अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि समूहों को इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी प्रदान नहीं की गयी कि उन्हें कितने बच्चों और महिलाओं के लिए पोषण आहार बनाना है? उसकी मात्रा कितनी होगी? इसके लिए कितनी राशि निर्धारित है? भुगतान कब किया जाएगा? आदि. ये जानकारियाँ इसलिए महत्व रखती हैं क्योंकि इन स्वयं सहायता समूहों का संचालन वंचित और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबकों की महिलायें करती हैं. इनके पास इतनी जमा या पूँजी नहीं थी कि ये अपने स्तर पर निवेश करके पोषण आहार की आपूर्ति बनाए रख पाती. राज्य स्तर पर एक माकूल व्यवस्था के अभाव में बच्चों को पोषण आहार से वंचित रहना पडा.

7.1 स्वयं सहायता समूहों ने औसतन 67 ग्राम प्रतिदिन के मान से पोषण आहार उपलब्ध करवाया है, जबकि मानकों के अनुसार बच्चों को 200 ग्राम/दिन और महिलाओं को 250 ग्राम प्रतिदिन के मान से पोषण आहार उपलब्ध करवाए जाने का प्रावधान था. 

7.2. इस तरह बच्चों को मानक से 66.5% और महिलाओं को 73% कम पोषण आहार प्राप्त हुआ. 

7.3. 88 प्रतिशत स्वयं सहायता समूहों को उनके द्वारा उपलब्ध करवाए गए पोषण आहार का 2से 4 महीने तक का भुगतान नहीं हुआ है. 

7.4. 88 प्रतिशत स्वयं सहायता समूहों को पोषण आहार आपूर्ति, व्यवस्था, मानकों आदि के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी. 3.5. पोषण आहार में आपूर्ति में इस कमी का सबसे बड़ा कारण राज्य शासन के निर्देशों का सहायता समूहों का न पहुंचना और भुगतान की व्यवस्था नहीं होना रहा है.

8. (मॉडरेट एक्यूट मेलन्यूट्रीशन - एसएएम/एमएएम -) की पहचानः पिछले दो महीनों में किसी भी हितग्राही का वजन और कद नहीं नापा गया है। सभी जिलों में किसी भी बच्चे की वृद्धि की निगरानी नहीं हुई है। 

9. गरम पका भोजनः कोविड-19 की वजह से सभी आंगनवाड़ी केंद्र बंद कर दिए गए हैं, इस वजह से 3-6 वर्ष आय वर्ग के 24 बच्चों में से किसी को भी किसी स्व-सहायता समूह (सेल्फ हेल्प ग्रुप-एसएचजी) की ओर से गरम पका भोजन नहीं दिया गया है। शासन दवारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार बच्चों को टीएचआर पैकेट्स और आरटीई दिया जाना चाहिए था।

10. प्राथमिक स्कूलों में मध्याहन भोजन: 58 प्रतिशत स्कूल जाने वाले बच्चों को मध्याह्न भोजन के एवज में कोई भोजन भत्ता नहीं दिया गया है. जिन्हें मिला है, उन्हें अनुशंसित दिशानिर्देशों के तहत लाभ मिला है, जो राज्य में उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार 3 किलो 300 ग्राम गेहं या चावल या दोनों है। 96 प्रतिशत बच्चों को अब भी 33 दिन के लिए ₹146 का अनुशंसित नगद भता नहीं मिला है। सतना की शकुंतला मवासी कहती हैं, "मेरा बड़ा बेटा रजनीश 8 साल का है और स्कूल जाता है। उसका एक समय का खाना स्कूल में ही हो जाता था। तब मुझे ज्यादा चिंता नहीं थी, लेकिन अब यह बंद हो गया है तो मुझे उसके भोजन की चिंता रहती है। उसे अब तक स्कूल से राशन नहीं मिला है..."

11. उच्चतर स्कूलों में मध्याह्न भोजन- अनुशंसाओं के अनुसार 80 प्रतिशत छात्रों को मध्याह्न भोजन भता (33 दिन के लिए 4,900 ग्राम) प्राप्त हुआ है, जबकि 20 प्रतिशत को अब भी कुछ मिलने का इंतजार है। इन हितग्राहियों में 30 प्रतिशत को नियमों के अनुसार नगद राशि प्राप्त हुई है, यानी 33 दिन के 221 रुपए, वहीं 70 प्रतिशत को अब तक कुछ नहीं मिला है।

12. सार्वजानिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिये राशन की उपलब्धता की स्थितिः 17 (52 प्रतिशत) परिवारों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (नेशनल फूड सिक्यूरिटी एक्ट - एनएफएसए.) की पात्रता के अनुसार योजना का लाभ मिला है, वहीं 6 (18 प्रतिशत) परिवार ऐसे हैं जो योजना के तहत आंशिक रूप से लाभान्वित हुए हैं यानी 100 प्रतिशत परिवार लाभ प्राप्त नहीं कर सके हैं।

13. स्तनपान की आवृत्तिः बढ़ी - दोनों आयु समूहों में स्तनपान की आवृत्ति बढ़ी है। स्तनपान में वृद्धि दिन में लगभग 12 बार है यानी आवृति दोगुनी हो गई है। स्पष्टतः, धात्री माता पर बोझ बढ़ा है तथा उसके पोषण आहार की आवश्यकता की प्रतिपूर्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। 

14. आहार की आवृति घटी- 6 महीने से तीन साल तक के बच्चे के लिए आहार की आवृति दिन में 6 बार से घटकर 3 बार रह गई है.

15. पीडीएस: पीडीएस से राशन की उपलब्धता 50 प्रतिशत तक सीमित है। पीडीएस से दैनिक आधार पर प्रदान किए जाने वाले अनाज की गणना 206 (बच्चे 6 महीने - 3 वर्ष) ग्राम और 219 ग्राम (बच्चे 3 - 6 वर्ष) के रूप में की गई है।

16. लॉकडाउन के दौरान गर्भवती महिलाएं आईसीएमआर द्वारा निर्धारित दैनिक आहार की केवल 33 ऊर्जा, कुल 41 प्रतिशत प्रोटीन, कुल 66 प्रतिशत वसा और कुल 44 प्रतिशत आयरन ही ग्रहण कर पा रही.

17. इसी तरह स्तनपान कराने वाली माताएं आवश्यकताओं के मुकाबले एक दिन में 32 प्रतिशत कैलोरी, 47 प्रतिशत प्रोटीन, 24 प्रतिशत कैल्शियम और 77 प्रतिशत आयरन ही ग्रहण कर पा रही हैं। 

18. इसी तरह, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा निर्धारित आरडीए की तुलना में बच्चों केवल आवश्यकता के मुकाबले केवल 49 प्रतिशत ऊर्जा , 59 प्रतिशत प्रोटीन, कुल 38 प्रतिशत कैल्शियम वसा और कुल 3 प्रतिशत आयरन ही ग्रहण कर पा रहे हैं.

सर्वे आधारित निष्कर्ष

1. टेक होम राशन- टीएचआर वितरण सेवाएं आंशिक रूप से लगभग 61 (50 प्रतिशत) गांवों को प्राप्त होने के कारण आवंटन में देरी, टीएचआर के भण्डार की अनुपलब्धता, कोरोना प्रसार को रोकने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों के बंद होने आदि के कारण प्रभावित हुई हैं। 32 (26 प्रतिशत) गांवों में लाभार्थियों के बीच आंगनवाड़ी द्वारा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के सहयोग से टीएचआर को अच्छी तरह से वितरित भी किया गया है। 

2. गरम पका भोजनः सरकार के आदेशों के अनुसार 85 प्रतिशत आंगनवाड़ी केंद्रों में गरम पका भोजन प्रदान करना पूरी तरह से बंद कर दिया गया है, जबकि पन्ना, सतना, शिवपुरी के 15 प्रतिशत गांवों में कोविड-19 को देखते हुए केंद्रों ने खुद ही इसे रोक दिया था। उन्हें इस संबंध में कोई आदेश नहीं मिला, लेकिन बाद में उन्हें फोन पर, व्हाट्सएप संदेश, मौखिक सन्देश या टेक्स्ट मैसेज के जरिये निर्देशित किया गया था। 

3. गृह भमण (होम विजिट्स); सर्वे वाले गांवों में 53 प्रतिशत आंगनवाड़ी केंद्र लॉकडाउन से अप्रभावित रहे और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अप्रैल के दूसरे सप्ताह से शुरू हुए नियमित पोषण परामर्श दौरे कर रही हैं। 40 प्रतिशत गांवों की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने कोरोना कोविड-19 लॉकडाउन होने के कारण घर-घर जाना पूरी तरह से बंद कर दिया है।

4. सामुदायिक आयोजन और ग्राम स्वस्थ्य स्वच्छता पोषण दिवस (विलेज हेल्थ सैनिटेशन न्यूट्रीशन हे. वीएचएसएनडी-): 77 प्रतिशत गांवों में कोई सामुदायिक कार्यक्रम नहीं हुए और वीएचएसएनडी को सामुदायिक कोविड-19 प्रोटोकॉल के तहत 58 प्रतिशत गांवों में पूरी तरह से रोक दिया गया है। 26 प्रतिशत गांवों में, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को इस बारे में निर्देशित नहीं किया जबकि 21 प्रतिशत गांवों में यह कार्यक्रम आयोजित करना प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।

5. वृद्धि निगरानी की स्थिति और गंभीर तीव्र कुपोषण (सीवियर एक्यूट मेलन्यूट्रीशन)/मध्यम तीव्र कुपोषण (मॉडरेट एक्यूट मेलन्यूटीशन - एसएएम/एमएएम-) की पहचानः 51 प्रतिशत गांवों में वृद्धि की निगरानी पूरी तरह से बंद है और 47 प्रतिशत गांवों की लगभग सभी आंगनवाड़ी में मध्यम तीव्र कुपोषण अकुपोषण बच्चों का प्रबंधन और पहचान रुक गई है। 

6. समीक्षा बैठक और कन्वर्जेस बैठकः स्वास्थ्य और आईसीडीएस विभागों के बीच नियमित रूप से कन्वर्जेस बैठकें सभी 122 गांवों में रोक दी गई हैं। इसी तरह, 74 प्रतिशत गांवों में नियमित समीक्षा बैठकें और पोषण बैठकें पूरी तरह से बंद हो गई हैं। 

7. बच्चों के लिए गरम पके भोजन का प्रावधानः किसी भी गांव ने लॉकडाउन में गर्म पका हआ भोजन (हॉट कुक्ड मील - एचसीएम-) की निरंतरता नहीं दिखाई, हालांकि, इसके एवज में मिलने वाला भता इस क्षेत्र में
सौ प्रतिशत नहीं हुआ। 

8. प्राथमिक और उच्चतर स्कूलों के लिए मध्याहन भोजनः 80 प्रतिशत गांवों के स्कूलों और साथ ही मध्याहन भोजन कार्यक्रमों को बंद करने के कारण एमडीएम को पूरी तरह से बंद कर दिया है। 20 प्रतिशत गांवों के स्कूलों ने अनुशंसित मानकों के अनुसार एमडीएम के स्थान पर भोजन भते का वितरण किया है। 

9. गांवों में पीडीएस की स्थिति: 78 प्रतिशत गांव इससे अप्रभावित रहे अर्थात् 95 गांवों ने कोविड-19 के दौरान राशन उपलब्ध कराना जारी रखा। इसके विपरीत जिलों के लगभग 22 प्रतिशत गांवों में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान आंशिक रूप से सेवाएं प्रभावित हुई हैं।
 

 


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