क्या मनरेगा के लिए आंवटित अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये का राहत पैकेज लॉकडाउन के दौरान वापस लौटे प्रवासी मजदूरों के लिए मददगार साबित होगा ?

क्या मनरेगा के लिए आंवटित अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये का राहत पैकेज लॉकडाउन के दौरान वापस लौटे प्रवासी मजदूरों के लिए मददगार साबित होगा ?

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published Published on Jul 23, 2020   modified Modified on Jul 24, 2020

साल 2020 की शुरुआत में सामाजिक कार्यकर्ताओं और संबंधित अर्थशास्त्रियों ने साल 2020-21 के लिए गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) के तहत कम से कम 1 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की मांग की. लेकिन 1 फरवरी को वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में वित्त वर्ष 2020-21 के लिए मनरेगा के तहत केवल Rs.61,500 करोड़ आवंटित किए. जोकि 2019-20 में मनरेगा पर खर्च किए गए फंड की तुलना में (यानी Rs.71,001.81 करोड़ का संशोधित अनुमान), 2020-21 में योजना के लिए निर्धारित राशि लगभग 9,501.81 करोड़ रुपये कम थी.

लगभग दो महीने बाद, कोरोना संक्रमण के चलते अचानक लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से बहुसंख्यक आबादी हैरान थी. लॉकडाउन ने न केवल औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया, बल्कि इसने सप्लाई चेन को भी बुरी तरह चौपट कर दिया (अधिक जानने के लिए कृपया यहाँ और यहाँ क्लिक करें). 25 मार्च, 2020 को लॉकडाउन के अचानक लागू होने के बाद, शहरों या शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले अनौपचारिक प्रवासी श्रमिक अपने गांव या मूल स्थानों की तरफ वापस लौटने लगे, जोकि मार्च से लेकर जून तक जारी रहा. गांव वापस लौटे गरीब श्रमिकों को आजीविका प्रदान करने के लिए मनरेगा के विस्तार के विचार को और अधिक बल मिला.

नियमित तौर पर, राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा मजदूरी को नए वित्तीय वर्ष के ठीक पहले यानी मार्च में संशोधित किया जाता है. इस साल भी, 23 मार्च को औसत मनरेगा मजदूरी दर औसतन 20 रुपये / - प्रतिदिन की बढ़ोतरी की गई, अर्थात मनरेगा मजदूरी को 2019-20 में Rs.182.1 से साल 2020-21 में 202.5 रुपए कर दिया गया, जोकि 1 अप्रैल, 2020 से प्रभावी होगा. हालांकि, सरकार ने घोषणा की कि मजदूरी में की गई बढ़ोतरी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना द्वारा जारी किए गए राहत पैकेज का एक हिस्सा थी. सरकार के अनुसार, मनरेगा के तहत मजदूरी वृद्धि से श्रमिकों को सालाना अतिरिक्त 2000 रुपये का फायदा होगा.  यह अनुमान है कि मजदूरी दरों में वृद्धि से लगभग 13.62 करोड़ परिवारों को आर्थिक रूप से फायदा पहुंचेगा.

सरकार की आलोचना करते हुए, नरेगा संघर्ष मोर्चा द्वारा 26 मार्च, 2020 को एक प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया गया है कि वित्तमंत्री द्वारा ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से प्रति परिवार औसतन 2000 रुपये अतिरिक्त प्रदान करने की घोषणा महज एक मिथ्या है. वास्तव में, 23 मार्च, 2020 को घोषित की गई मजदूरी दर में वृद्धि, हर साल होने वाली मुद्रास्फीति के खिलाफ एक नियमित समायोजन है. सुश्री निर्मला सीतारमण को इसे "अतिरिक्त सहायता" नहीं बताना चाहिए था. इसके अलावा, केंद्र सरकार ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी प्रदान करने के संवैधानिक मानदंड का पालन नहीं किया. लॉकडाउन के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार अपने पैतृक गाँवों में वापस लौट गए हैं, तो सीधे-सीधे वित्तीय वर्ष 2020-21 में अधिक ग्रामीण निवासियों को मनरेगा के तहत काम करने की आवश्यकता होगी. नरेगा संघर्ष मोर्चा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों में, ग्रामीण इलाकों में प्रति दिन काम के दिनों की संख्या 100 दिनों तक सीमित नहीं होनी चाहिए.

इस वर्ष जून में, महामारी के लिए मनरेगा के लिए  40,000 करोड़  रुपये की अतिरिक्त राशि की व्यवस्था की गई थी, जो महामारी के परिणामस्वरूप उभरे कठिन दौर में जरूरतमंद कामगारों को रोजगार प्रदान करने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत जारी की गई थी. 2 जून, 2020 के एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, सीधे राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में 28,000 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है.

ऐसे में यह सवाल उठता है कि जरूरतमंदों और हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए उपयुक्त मनरेगा रोजगार सृजित करने के लिए सरकार द्वारा जारी 1,01,500 करोड़ रुपये की राशि पर्याप्त है, जिसमें वे प्रवासी भी शामिल हैं जो शहरों से वापस अपने मूल स्थानों पर लौट आए हैं. मनरेगा की स्थिति से संबंधित डेटा (28 जून, 7 जुलाई, 8 जुलाई और 9 जुलाई को) मनरेगा योजना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुभाग 'एट ए ग्लांस' (mnregaweb4.nic.in/netnrega/all_lvl_details_dashboard_new.aspx)) और 'MIS रिपोर्ट' (http://mnregaweb4.nic.in/netnrega/MISreport4.aspx)  से एक्सेस किया गया है. (http://mnregaweb4.nic.in/netnrega/MISreport4.aspx)

स्वीकृत श्रम बजट और कार्य

2014-15 में मनरेगा के लिए स्वीकृत श्रम बजट 220.67 करोड़ व्यक्ति-दिवस था, जिसे 2015-16 में लगभग 8.4 प्रतिशत बढ़ाकर 239.11 करोड़ व्यक्ति-दिवस कर दिया गया था. 2018-19 में स्वीकृत श्रम बजट 256.56 करोड़ व्यक्ति-दिवस था और 2019-20 में, यह 276.76 करोड़ व्यक्ति-दिन था। 2014-15 की तुलना में 2014-15 में स्वीकृत श्रम बजट लगभग 25.4 प्रतिशत अधिक था। कृपया चार्ट -1 देखें.

चार्ट 1: स्वीकृत श्रम बजट (करोड़ व्यक्ति-दिवस में)

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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गौरतलब है कि चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में स्वीकृत श्रम बजट 280.76 करोड़ व्यक्ति-दिन होने का अनुमान था. हालांकि, मनरेगा में 40,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त आंवटन से, सरकार को उम्मीद है कि वह कुल मिलाकर लगभग 306.6 करोड़ व्यक्ति-दिवस कार्य उत्पन्न करेगा, जो 2020-21 के मानसून सत्र के दौरान वापस लौटे प्रवासी श्रमिकों को समायोजित कर सकता है.

इस तथ्य को देखते हुए कि लाखों अकुशल प्रवासी श्रमिक कोविड-19 लॉकडाउन के कार्यान्वयन के बाद शहरों और शहरी क्षेत्रों से अपने गांवों / मूल स्थानों पर वापस आ गए, स्वीकृत श्रम बजट को ग्रामीण आजीविका को सहारा देने के लिए और अधिक बढ़ा दिया जाना चाहिए था. मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि अधिकांश श्रमिक ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान पर मनरेगा को चुन रहे हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश अकुशल, कम-कुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक हैं (कृपया यहाँ, यहाँ और यहाँ क्लिक करें). नरेगा संघर्ष मोर्चा से जुड़े प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता देबमाल्या नंदी का मानना ​​है कि हाल ही में शुरू किए गए गरीब कल्याण रोज़गार अभियान, जिसमें छह राज्यों के 116 अधिक प्रवासी "जिलों" को शामिल करने की उम्मीद है, को कोई अतिरिक्त बजटीय आवंटन नहीं मिला है. यह योजना केवल 12 लाइन विभागों / मंत्रालयों का एक अभिसरण है जो 25 सार्वजनिक कार्य श्रेणियों से संबंधित मौजूदा परिसंपत्ति निर्माण कार्यक्रमों को निष्पादित करने के लिए है. बेहतर होता कि सरकार यह योजना देश के सभी ग्रामीण जिलों में पर्याप्त बजटीय सहायता के साथ शुरू करती. ऐसा हो सकता है कि बिहार के 38 में से 32 जिलों (जहाँ जल्द ही विधानसभा चुनाव होंगे) से राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए यह योजना शुरू की गई है.

बिहार सहित कई राज्यों में, मनरेगा मजदूरी के लिए आवेदन करने वाले प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा के अपर्याप्त कार्य और अपर्याप्त वित्तीय सहायता के कारण काम देने से मना कर दिया गया. इसके लिए आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर नौकरी नहीं दिए जाने के बावजूद उन्हें बेरोजगारी भत्ता नहीं मिला.

चालू वित्त वर्ष में, 8.2 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत काम करने की मांग की, जबकि देश में 9 जुलाई, 2020 तक केवल 6.5 करोड़ लोगों को ही रोजगार उपलब्ध कराया गया है. बिहार से श्रमिक आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में आजीविका कमाने के लिए पलायन करते हैं. लेकिन अबके, बिहार में 9 जुलाई, 2020 तक लगभग 43 लाख श्रमिकों ने मनरेगा रोजगार की मांग की, जबकि, केवल 32.5 लाख श्रमिकों को ही काम दिया जा सका है.

गौरतलब है कि मनरेगा के तहत साल 2020-2021 के लिए प्रति व्यक्ति प्रति दिन औसत लागत 230 रुपये के हिसाब से जोड़ी गई है, जो कि वित्तीय वर्ष 2018-19 (247.2 रुपये) और 2019-20 (240.8 रुपये) के मुकाबले कम है.

यह जानना भी जरूरी है कि मनरेगा के तहत श्रम बजट अगले वित्तीय वर्ष के लिए किए जाने वाले कार्यों का मूल्यांकन कर उन्नत श्रम अनुमान को संदर्भित करता है. एक जिले में श्रम की मांग का अग्रिम मूल्यांकन रोजगार और आजीविका के अवसरों के साथ संबंधित ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी पहलुओं को ध्यान में रखता है. श्रम बजट अनुमानों के आधार पर, केंद्र सरकार जिलों के प्रति अपनी केंद्रीय देनदारी का अनुमान लगाती है. अधिक जानकारी के लिए, कृपया यहाँ और यहाँ क्लिक करें.

चार्ट -2 के मुकाबले चार्ट -1 की तुलना करने पर, यह पता चलता है कि स्वीकृत श्रम बजट के अनुसार मनरेगा के तहत अनुमानित रोजगार वित्तीय वर्ष 2014-15, 2015-16 और 2019-20 में सृजित हुए रोजगार व्यक्ति-दिनों की वास्तविक संख्या को पार कर गए यानि अधिक काम दिए गए.

मनरेगा के लिए 256.56 करोड़ व्यक्ति-दिनों के स्वीकृत श्रम बजट के उल्ट, 2018-19 में सृजित वास्तविक रोजगार 267.96 करोड़ व्यक्ति-दिवस था. 2016-2017 और 2017-18 में भी यही स्थिति देखी गई है (यानी स्वीकृत श्रम बजट से अधिक काम दिया जा रहा है). पाठक ध्यान दें कि वर्ष 2016-17 में नोटबंदी की गई थी, जिससे कि वैकल्पिक काम के अवसरों के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के तहत रोजगार की मांग को बढ़ा सकती थी. नोट बंदी ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया था.

चार्ट 2: अब तक सृजित रोजगार (करोड़ व्यक्ति-दिवस में)

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020 )

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25.4 करोड़ व्यक्ति-दिवस के अनुमानित रोजगार सृजन के उल्ट, अप्रैल 2020 तक सृजित वास्तविक रोजगार 14.1 करोड़ व्यक्ति दिवस थे. लगभग 68 करोड़ व्यक्ति-दिवस के अनुमानित रोजगार सृजन के उल्ट, जून 2020 तक सृजित वास्तविक रोजगार 70.9 करोड़ व्यक्ति-दिन था. मनरेगा के तहत सृजित वास्तविक रोजगार (लगभग 125.6 करोड़ व्यक्ति-दिन) जून 2020 में अनुमानित रोजगार (लगभग 110.3 करोड़ व्यक्ति-दिवस) से अधिक हो गया (8 जुलाई, 2020 तक).

यहाँ यह कहा जा सकता है कि लगभग 2.18 लाख परिवारों ने 7 जुलाई, 2020 तक मनरेगा के तहत चालू वित्त वर्ष में मजदूरी के 100 दिन पूरे कर लिए. हम इस बारे में और चर्चा करेंगे.

गरीबों और हाशिए के लोगों के लिए अंतिम उम्मीद है मनरेगा

अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अनुसूचित जाति (एससी) समूहों से संबंधित ग्रामीण समुदाय में मनरेगा के तहत रोजगार की अधिक मांग है. ऐसा इसलिए है क्योंकि सामान्य जाति के व्यक्तियों की तुलना में आय और गैर-आय दोनों तरह की गरीबी अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अनुसूचित जाति (एससी) के लोगों में अपेक्षाकृत अधिक है. मनरेगा से प्राप्त होने वाली मजदूरी उन गरीब पुरुषों और महिलाओं को आजीविका कमाने में मददगार साबित होती है जो योजना के तहत मेहनत-मजदूरी करते हैं.

आधिकारिक मनरेगा वेबसाइट के डेटा से पता चलता है कि वर्ष 2014-15 में सृजित कुल रोजगार (व्यक्ति-दिनों में) में से 22.4 प्रतिशत कार्य दलित श्रमिकों ने किया था. हालांकि साल दर साल, यह अनुपात कम हो गया (वर्ष 2017-18 अपवाद है जब इसमें पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी उछाल देखी गई), और यह अंततः 2019-20 में 19.74 प्रतिशत तक पहुंच गया. कृपया चार्ट -3 देखें.

चार्ट 3: कुल काम के अनुपात में (व्यक्ति-दिनों में) दलितों के लिए सृजित रोजगार (व्यक्ति-दिनों में), प्रतिशत में

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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हालांकि, आदिवासी मजदूरों के मामले में एक अलग ट्रेंड सामने आया. साल 2014-15 में कुल काम (व्यक्ति-दिनों में) के अनुपात के रूप में आदिवासी मजदूरों के लिए सृजित कार्य-दिवस लगभग 17 प्रतिशत थे. 2015-16 में यह अनुपात बढ़कर 17.8 प्रतिशत हो गया. 2018-19 में यह आंकड़ा 17.4 प्रतिशत और 2019-20 में 18.3 प्रतिशत था. विवरण के लिए कृपया चार्ट -4 देखें.

चार्ट 4: कुल काम के अनुपात में (व्यक्ति-दिवस में) आदिवासी मजदूरों के लिए सृजित रोजगार (व्यक्ति-दिनों में), प्रतिशत में

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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वर्ष 2014-15 में सृजित (व्यक्ति-दिनों में) कुल रोजगार में से, 54.9 प्रतिशत रोजगार महिला श्रमिकों को मिला. साल 2015-16 में यह अनुपात बढ़कर 55.3 प्रतिशत हो गया. साल 2018-19 में, संबंधित आंकड़ा 54.6 प्रतिशत था और 2019-20 में यह लगभग समान रहा यानी 54.7 प्रतिशत. विवरण के लिए कृपया चार्ट -5 देखें.

चार्ट 5: कुल काम के अनुपात में (व्यक्ति-दिवस में) महिलाओं के लिए सृजित रोजगार (व्यक्ति-दिवस में), प्रतिशत में

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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आधिकारिक मनरेगा वेबसाइट से संबंधित एमआईएस डेटा से पता चलता है किचालू वित्तीय वर्ष में 7 जुलाई, 2020 तक, कुल रोजगार में 20.4 प्रतिशत (व्यक्ति-दिनों में) रोजगार अनुसूचित जाति के श्रमिकों को मिला है और कुल सृजित रोजगार में 18.9 प्रतिशत रोजगार आदिवासी श्रमिकों को मिला है. वर्तमान वर्ष में कुल मनरेगा से सृजित रोजगार में लगभग 52 प्रतिशत (व्यक्ति-दिनों में) रोजगार महिला श्रमिकों को मिला है.

अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ज्यादातर अनौपचारिक क्षेत्र की दिहाड़ी-मजदूरी महिला श्रमिकों के अलावा दलित और आदिवासी प्रवासी श्रमिकों द्वारा की जाती है. इसलिए, जब लॉकडाउन लगाया गया, तो सबसे अधिक प्रभावित वहीं लोग हुए और वे अपने गांवों / मूल स्थानों पर वापस लौटने के लिए शहरों से पैदल ही निकल पड़े. यह संभव है कि ज्यादातर दलित और आदिवासी पुरुष कामगार अपने गाँवों में पहुँचने के बाद मनरेगा के तहत काम पाने के लिए आवेदन करें. हाल के कई अध्ययन (कृपया यहां और यहां क्लिक करें) यह भी संकेत देते हैं कि लॉकडाउन ने महिलाओं को अलग तरीके से प्रभावित किया है. यद्यपि वैतनिक यानी पैसे मिलने वाले काम में उनका हिस्सा कम हो गया है, लेकिन लॉकडाउन के बाद, उनपर अवैतनिक देखभाल कार्य (घरेलू काम) का बोझ बढ़ गया है.

मनरेगा से सृजित रोजगार

शीर्ष अर्थशास्त्री सी रंगराजन और एस महेंद्र देव ने गणना की है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार 5.48 करोड़ परिवारों को दैनिक वेतन दर प्रति व्यक्ति 202.5 रुपये के हिसाब से 100 दिनों की गारंटीकृत रोजगार देती है, तो, सरकार को चालू वित्त वर्ष में 1.44 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. वर्तमान में, मनरेगा औसतन एक वर्ष में लगभग 50 दिन का रोजगार प्रदान करता है, हालांकि अधिनियम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है. यही वजह है कि योजना के लिए 1,01,500 करोड़ रुपये का वर्तमान आवंटन अपर्याप्त है. यदि मनरेगा के तहत 5.48 करोड़ ग्रामीण परिवारों के लिए गारंटीकृत कार्य की अवधि 100 दिन से 150 दिन तक बढ़ा दी जाती है, तो सरकार को साल 2020-21 में 2.16 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. कृपया नीचे दी गई तालिका देखें.

स्रोत: A safety net, post Covid: We need to provide minimum income for poor and vulnerable -C Rangarajan and S Mahendra Dev, The Indian Express, 3 जुलाई, 2020, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.

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मनरेगा के आलोचक अक्सर यह तर्क देते हैं कि यह योजना काम के लिए आवेदन करने वाले मेहनत-मजदूरी करने वाले श्रमिकों (unskilled manual workers) को 100 दिन का रोजगार देने में विफल रही है. हालांकि, श्रमिकों को समय पर मनरेगा की मजदूरी का भुगतान न करना और दैनिक मजदूरी दरों में मामूली संशोधन जैसी कई ऐसी खामियां हैं जो, अनेक राज्यों में गरीबों को इस योजना से जुड़ने नहीं देतीं. यह गौरतलब है कि जनवरी 2009 में, भारत सरकार ने मनरेगा की धारा 6 (1) के तहत एक अधिसूचना जारी की, जिसमें मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम से मुक्त कर दिया गया. वर्तमान में, कई राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा मजदूरी दरें न केवल बाजार की मजदूरी दरों से कम हैं, बल्कि अकुशल कृषि श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी दरों से भी नीचे हैं.

2014-15 में, प्रति परिवार प्रदान किए जाने वाले रोजगार के दिनों की औसत संख्या लगभग 40.2 दिन थी, जो 2015-16 में बढ़कर 48.9 दिन हो गई यानी 21.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई. साल 2018-19 में मनरेगा के तहत प्रति परिवार रोजगार देने की औसत संख्या 50.9 दिन थी, जोकि साल 2019-2020 में घटकर 48.4 दिन हो गई. कृपया चार्ट -6 देखें.

चार्ट 6: एक वर्ष में प्रति परिवार रोजगार के दिनों की औसत संख्या

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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2014-15 में मनरेगा के तहत 100 दिनों का काम पूरा करने वाले परिवारों का अनुपात केवल 6 प्रतिशत था. 2015-16 में यह अनुपात बढ़कर 10.1 प्रतिशत हो गया. 2018-19 में, यह अनुपात लगभग 9.98 प्रतिशत था, लेकिन यह 2019-20 में गिरकर 7.4 प्रतिशत हो गया.

आधिकारिक वेबसाइट के एमआईएस डेटा से पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष में मनरेगा के तहत 100 दिनों का काम पूरा करने वाले परिवारों का अनुपात 7 जुलाई, 2020 तक 0.46 प्रतिशत है.

2014-15 में, 6.22 करोड़ लोगों ने मनरेगा के तहत काम किया, जो 2015-16 में बढ़कर 7.23 करोड़ हो गया, यानी 20.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. 2018-19 में, 7.77 करोड़ लोगों ने इस योजना के तहत काम किया, जबकि 2019-20 के दौरान 7.89 करोड़ श्रमिकों को इस योजना के तहत काम मिला. कृपया विवरण के लिए चार्ट -7 देखें.

चार्ट 7: मनरेगा के तहत काम करने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या (करोड़ों में)

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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अप्रैल-जून 2020 के दौरान, मनरेगा द्वारा प्रदान किया गया रोजगार 125.6 करोड़ व्यक्ति-दिवस था. हालांकि, पिछले वर्ष की इसी अवधि में, मनरेगा द्वारा प्रदान किया गया रोजगार 96.5 करोड़ व्यक्ति-दिवस था. इसलिए, मनरेगा के तहत रोजगार में अप्रैल-जून 2019 और अप्रैल-जून 2020 के बीच 29.1 करोड़ व्यक्ति-दिवस की बढ़ोतरी देखी गई है. यह इस वजह से हुआ कि सरकार ने कोविड-19 लॉकडाउन लागू होने के लगभग एक महीने बाद 20 अप्रैल से केवल मनरेगा मजदूरों को काम करने की अनुमति दी और संशोधित लॉकडाउन दिशानिर्देशों के अनुसार, इसके लिए धन जारी किया.

जैसा कि ऊपर बताया गया, सरकार ने श्रम बजट को 280.76 करोड़ व्यक्ति-दिवस से बढ़ाकर 306.6 करोड़ व्यक्ति-दिवस कर दिया है, जिसके लिए 61000 करोड़ रुपये के केंद्रीय बजट के अलावा अतिरिक्त 40000 करोड़ रुपये का बजट जारी किया.

मनरेगा के तहत औसत दैनिक मजदूरी दर

मनरेगा के तहत प्रति व्यक्ति औसत दैनिक मजदूरी दर 2014-15 में 143.9. रुपये थी, जो 2015-16 में बढ़कर 1,54.1 रुपये हो गई, यानी 7.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. प्रति व्यक्ति औसत दैनिक मजदूरी दर 2018-19 में 179.1 रुपये और 2019-20 में 182.1 रुपये थी. कृपया चार्ट -8 देखें.

चार्ट 8: प्रति व्यक्ति प्रति दिन औसत मजदूरी दर (रुपये में)

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट में पाया गया था कि जुलाई-सितंबर 2017, अक्टूबर-दिसंबर 2017, जनवरी-मार्च 2018 और अप्रैल-जून 2018 के दौरान सार्वजनिक कार्यों के अलावा अन्य कार्यों में लगे अनौपचारिक मजदूरों (ग्रामीण क्षेत्रों में) में पुरुष मजदूरों की औसत दैनिक मजदूरी आय 253 रुपये से 282 रुपये और महिला मजदूरों की औसत दैनिक आय 166 रुपये से लेकर 179 रुपये थी. इसके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में, जुलाई-सितंबर 2017, अक्टूबर-दिसंबर 2017, जनवरी-मार्च 2018 और अप्रैल-जून 2018 के दौरान मनरेगा के तहत होने वाले सार्वजनिक कार्यों में लगे अनौपचारिक श्रमिकों में पुरुष मजदूरों की औसत दैनिक मजदूरी आय 141 रुपये से लेकर 171 रुपये और महिला मजदूरों की दैनिक आय लगभग 131 रुपये से लेकर 165 रुपये थी.

शहरों से गांवों में लौटने वाले प्रवासियों के बड़े पैमाने पर बढ़ती आबादी को देखते हुए, मनरेगा श्रमिकों ने हाल ही में कम से कम 600 रुपये प्रति व्यक्ति की दैनिक मजदूरी दर और 200 दिनों के रोजगार के अलावा स्थानीय स्तर पर नियोजित कार्यों का सख्त कार्यान्वयन की मांग की.  

शून्य खर्च वाली ग्राम पंचायतें

2014-15 में, 39,531 ऐसी ग्राम पंचायतें थीं, जिन्होंने मनरेगा के तहत एक रुपया भी खर्च नहीं किया. 2015-16 में, ऐसी ग्राम पंचायतों की संख्या 39,469 थी. एक रुपया भी खर्च न करने वाली ग्राम पंचायतों की संख्या 2018-19 में 10,978 और 2019-20 में 10,957 थी. कृपया चार्ट -9 देखें।

चार्ट 9: एक रुपया भी खर्च न करने वाली ग्राम पंचायतों की कुल संख्या

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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यहाँ यह भी गौरतलब है कि चालू वित्त वर्ष में 'लेबर प्रोजेक्शन' यानी श्रमिकों का ब्योरा न देने वाली ग्राम पंचायतों की कुल संख्या 35,206 है, जो 9 जुलाई 2020 तक कुल ग्राम पंचायतों का 13.3 प्रतिशत है. चालू वित्त वर्ष में “वर्क प्रोजेक्शन” यानी काम का ब्योरा न दर्ज करवाने वाली कुल ग्राम पंचायतों की संख्या 47,980 है, जो कि 9 जुलाई, 2020 तक कुल ग्राम पंचायतों का 18.1 प्रतिशत है. ग्राम पंचायत, जिन्होंने लेबर प्रोजेक्शन और / या वर्क प्रोजेक्शन यानी श्रमिक और कार्य का ब्योरा नहीं दर्ज करवाया है, उनमें मनरेगा पर खर्च की संभावनाएं कम हैं.

मनरेगा के तहत किए गए विभिन्न कार्य

2014-15 में शुरू किए गए कार्यों की कुल संख्या के अनुपात में पूरे किए गए कार्यों की कुल संख्या 30.1 प्रतिशत थी. 2015-16 में यह आंकड़ा 29.4 प्रतिशत था. 2018-19 में, शुरू किए गए कार्यों की कुल संख्या के अनुपात में पूरे किए गए कार्यों की कुल संख्या 45.8 प्रतिशत थी. 2019-20 में संबंधित आंकड़ा लगभग 37 प्रतिशत हो गया.

Https://vikaspedia.in के अनुसार, मनरेगा के तहत किए जाने वाले कार्यों को मुख्य रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. श्रेणी ए: प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से संबंधित लोक निर्माण;

2. श्रेणी बी: ​​कमजोर वर्गों के लिए व्यक्तिगत संपत्ति (केवल अनुसूची 1 के अनुच्छेद 5 में परिवारों के लिए);

3. श्रेणी सी: डीएएन-एनआरएलएम स्वयं सहायता समूहों के लिए सामान्य बुनियादी ढांचा;

4. श्रेणी डी: ग्रामीण बुनियादी ढांचा; तथा

5. व्यक्तिगत किसान की जमीन

2014-15 में कुल मनरेगा खर्चों में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन-एनआरएम (यानी श्रेणी ए) से संबंधित कार्यों पर खर्च का हिस्सा 55.4 प्रतिशत था, जो 2015-16 में बढ़कर 59.7 प्रतिशत हो गया. 2018-19 में यह आंकड़ा 58.8 प्रतिशत और 2019-20 में 62.1 प्रतिशत था. चालू वित्त वर्ष में, 8 जुलाई, 2020 तक कुल मनरेगा खर्चों में एनआरएम से संबंधित कार्यों पर खर्च का हिस्सा लगभग 79 प्रतिशत है.

 ‘श्रेणी एमें करवाया जाने वाला कार्य कमजोर और हाशिए पर रह रहे समुदायों को सूखे और वर्षा की कमी से बचाने में मदद कर सकता है. श्रेणी ए में निम्नलिखित काम शामिल हैं:

* भूजल को बढ़ाने और भूमिगत डाइक, मिट्टी के बांध, बाढ़ को रोकने के लिए बनाए जाने वाले बांध, चेक बांध बनाने और उनमें सुधार करके जल संरक्षण और जल संचयन संरचनाएं; पेयजल स्रोतों सहित भूजल के स्तर को बढ़ाने के लिए कार्य किया जाता है;

* वाटरशेड मैनेजमैंट जैसे कि ताल, छतों, कौंटूर बंड्स, बोल्डर चेक, गेबियन संरचनाओं और स्प्रिंग शेड विकास के लिए कार्य करवाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप वाटरशेड मैनेजमेंट में सुधार किया जाता है;

* सूक्ष्म और लघु सिंचाई कार्य और सिंचाई नहरों और नालियों का निर्माण, नवीनीकरण और रखरखाव;

* सिंचाई के टैंकों और अन्य जल निकायों की साफ-सफाई सहित पारंपरिक जल निकायों का नवीनीकरण;

* वन भूमि, सड़कों के किनारे, नहर के किनारे, तालाब के किनारों पर और तटीय बेल्ट में वनीकरण और वृक्षारोपण करना तथा पैराग्राफ 5 में शामिल परिवारों की जमीन पर बागवानी करना;

* पंचायती या सामुदायिक जमीन को सुधारना.

कुल मनरेगा कार्यों में कमजोर वर्गों (यानी श्रेणी बी) के लिए व्यक्तिगत परिसंपत्तियों से संबंधित कार्यों का हिस्सा 2014-15 में 21.4 प्रतिशत था, जो 2015-16 में बढ़कर 33.8 प्रतिशत हो गया. 2018-19 में, यह आंकड़ा 67.6 प्रतिशत था और 2019-20 में, यह लगभग 67 प्रतिशत था. वर्तमान वित्तीय वर्ष में, 8 जुलाई, 2020 तक कुल मनरेगा कार्यों में श्रेणी बीसे संबंधित कार्यों की हिस्सेदारी लगभग 63 प्रतिशत है.

 ‘श्रेणी बी में निम्नलिखित काम शामिल हैं:

* भूमि विकास के माध्यम से पैराग्राफ 5 में निर्दिष्ट परिवारों की भूमि की उत्पादकता में सुधार और सिंचाई के लिए उपयुक्त बुनियादी ढाँचा प्रदान करना जिसमें कुँआ खोदना, तालाब और अन्य जल संचयन संरचनाएँ शामिल हैं;

* बागवानी, सेरीकल्चर, वृक्षारोपण और कृषि वानिकी के माध्यम से आजीविका में सुधार;

* खेती के तहत इसे लाने के लिए अनुसूची 1 के अनुच्छेद 5 में शामिल परिवारों की परती या बंजर भूमि का विकास;

* आवास योजना या ऐसी अन्य राज्य या केंद्र सरकार की योजना के तहत स्वीकृत घरों के निर्माण में दिहाड़ी मजदूरी करवाना;

* पशुधन को बढ़ावा देने के लिए आधारभूत संरचना बनाना, जैसे कि मुर्गी पालन, बकरी पालन बाड़ा, सुअर पालन बाड़ा, मवेशी बाड़ा और मवेशियों के लिए चारा कुंड; तथा

* मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढाँचा बनाना, जैसे मछली पकड़ने के लिए यार्ड, भंडारण की सुविधा, और सार्वजनिक भूमि पर मौसमी जल निकायों में मत्स्य पालन को बढ़ावा देना.

2014-15 में कुल मनरेगा खर्च में कृषि और अन्य गतिविधियों से संबंधित कार्यों पर खर्च का हिस्सा 52.8 प्रतिशत था, जो 2015-16 में बढ़कर 62.9 प्रतिशत हो गया. 2018-19 में, यह आंकड़ा 63.4 प्रतिशत और 2019-20 में 66.4 प्रतिशत था. चालू वित्त वर्ष में, 8 जुलाई, 2020 तक कुल मनरेगा व्यय में कृषि और संबद्ध गतिविधियों से संबंधित कार्यों पर खर्च का हिस्सा 79.9 प्रतिशत है. कृपया चार्ट -10 देखें.

चार्ट 10: कृषि और इसे संबंधित कार्यों पर खर्च, प्रतिशत में

स्रोत: मनरेगा की आधिकारिक वेबसाइट के ‘At a Glance 'अनुभाग से, एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें (अंतिम एक्सेस 28 जून, 2020)

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मनरेगा के लिए आवंटित 40,000 करोड़ रुपये के साथ, सरकार बड़ी संख्या में टिकाऊ और आजीविका संपत्ति बनाना चाहती है, जिसमें जल संरक्षण परिसंपत्तियां शामिल हैं जो अधिक उत्पादन कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी.

[बालू एन वरदराज और नबारुन सेनगुप्ता, जो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, हैदराबाद से डेवलपमेंट स्टडीज (प्रथम वर्ष) में एमए कर रहे हैं. इन दोनों ने सोसाइटी फॉर लेबर एंड डेवलपमेंट द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट का सारांश तैयार करने में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की मदद की. बालू और नबारुन ने जून-जुलाई 2020 में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज प्रोजेक्ट में अपनी इंटर्नशिप के दौरान यह काम किया है.]

 

References:

Press note: Prime Minister Narendra Modi launches Garib Kalyan Rojgar Abhiyaan on 20th June 2020 to boost employment and livelihood opportunities for migrant workers returning to villages, in the wake of COVID-19 outbreak, Prime Minister's Office, Press Information Bureau, dated 20th June, 2020, please click here to access

Press note: All-time high amount of Rs. 61,500 crore allocated under MGNREGA for the FY 2020-21; Additional provision of Rs. 40,000 crore made for this programme under Atmanirbhar Bharat Abhiyaan to provide employment during the difficult period arising of COVID-19, Ministry of Rural Development, Press Information Bureau, dated 2nd June, 2020, please click here to access 

Press Release: Finance Minister announces Government Reforms and Enablers across Seven Sectors under Atmanirbhar Bharat Abhiyaan, Ministry of Finance, Press Information Bureau, dated 17th May, 2020, please click here to access

Press release: Finance Minister announces Rs 1.70 Lakh Crore relief package under Pradhan Mantri Garib KalyanYojana for the poor to help them fight the battle against Corona Virus, Ministry of Finance, Press Information Bureau, dated 26th March, 2020, please click here to access

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Budget Speech by the Finance Minister dated 1st February 2020, please click here to access

Notes on Demands for Grants, 2020-2021, Department of Rural Development, Ministry of Rural Development, Budget Documents, Ministry of Finance, please click here to access

Annual Report on Periodic Labour Force Survey (July 2017 - June 2018), National Statistical Office, released in May 2019, please click here to access

Discussion Paper no. 30: The Covid-19 Lockdown in India: Gender and Caste Dimensions of the First Job Losses -Ashwini Deshpande, released in June 2020, Department of Economics, Ashoka University, please click here to access

CSE Working Paper: Pandemic, informality, and vulnerability: Impact of COVID-19 on livelihoods in India -Surbhi Kesar, Rosa Abraham, Rahul Lahoti, Paaritosh Nath and Amit Basole, released in June 2020, Center for Sustainable Employment at Azim Premji University, please click here to access

COVID-19 Lockdown: Impact on Agriculture and Rural Economy -Vikas Rawal, Manish Kumar, Ankur Verma and Jesim Pais, Society for Social and Economic Research Monograph 20/3, please click here and here to access

'Unlocking the Urban: Reimagining Migrant Lives in Cities Post-COVID 19', Aajeevika Bureau, released on 1st May, 2020, please click here to access

MGNREGA workers demand Rs. 600 as minimum daily wage rate, besides 200 days of employment and strict implementation of locally planned works, Press release by NREGA Sangharsh Morcha dated June 29th, 2020, please click here to access

FM’s announcement of Rs 1.7 lakh crore in the wake of COVID-19, is less than half of the Rs. 3.75 lakh crores required to fulfill the minimal “emergency measures”, convey concerned citizens & grassroots activists, Press releases by NREGA Sangharsh Morcha dated 26th March, 2020, please click here to access

News alert: SWAN’s third report outlines the perpetual plight of migrants in terms of food shortage, income insecurity and travel difficulties during lockdown, Inclusive Media for Change,  Published on June 14th, 2020, please click here to access

News alert: Lockdown led to massive job losses, show early results of an ongoing telephonic survey, Inclusive Media for Change, Published on May 13th, 2020, please click here to access

News alert: MGNREGA allocation is way off the mark to uplift the rural economy & address economic downturn, say Right to Work activists, Inclusive Media for Change, Published on February 3rd, 2020, please click here to access

News alert: No change in MGNREGA wage rates observed between 2018-19 and 2019-20 for 4 states & 2 UTs, Inclusive Media for Change, Published on April 16th, 2019, please click here to access

News alert: Country's non-income-based poverty level has fallen over the past 10 years, shows new report, Inclusive Media for Change, Published on October 30th, 2018, please click here to access

COVID-19 rural crisis: Why MGNREGA needs a harder push -Debmalya Nandy, Down to Earth, 5th July, 2020, please click here to access

Reset rural job policies, recognise women’s work -Madhura Swaminathan, The Hindu, 4th July, 2020, please click here to access

A safety net, post Covid: We need to provide minimum income for poor and vulnerable -C Rangarajan and S Mahendra Dev, The Indian Express, 3rd July, 2020, please click here to access

Utilise MGNREGA to the fullest capacity -Brinda Karat, The Hindu, 1st July, 2020, please click here to access

86 per cent jump in MGNREGA demand in districts most migrants returned to -Harikishan Sharma, The Indian Express, 29th June, 2020, please click here to access 

Of UP govt’s 1.25 crore jobs, over 1 crore went to MGNREGA and MSME sectors -Maulshree Seth, The Indian Express, 27th June, 2020, please click here to access

Will Bihar's Economy Rise to the Reverse Migration Challenge? -Santosh Mehrotra and Baikunth Roy, TheWire.in, 23rd June, 2020, please click here to access

Uttar Pradesh employed 57.13 lakh under MGNREGA, ‘highest in country’ -Maulshree Seth, The Indian Express, 16th June, 2020, please click here to access

How covid-19 locked out women from jobs -Rukmini S, Livemint.com, 11th June, 2020, please click here to access

How many migrant workers displaced? A range of estimates -Seema Chishti, The Indian Express, 8th June, 2020, please click here to access



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