"हम मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के गवाह बन रहे हैं"

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published Published on May 3, 2021   modified Modified on May 3, 2021

-न्यूजलॉन्ड्री,

उत्तर प्रदेश में 2017 में सांप्रदायिक रूप से एक बहुत ही बंटे हुए चुनावी अभियान के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मैदान में उतरे तो हालात की उत्तेजना और बढ़ गई. एक सार्वजनिक मंच से उन्होंने राज्य सरकार पर - जो एक विपक्षी दल के हाथ में थी - आरोप लगाया कि वह श्मशानों की तुलना में कब्रिस्तानों पर अधिक खर्च करके मुसलमानों को खुश कर रही है. अपने हमेशा के हिकारत भरे अंदाज में, जिसमें हरेक ताना और चुभती हुई बात एक डरावनी गूंज पर खत्म होने से पहले, वाक्य के बीच तक आते-आते एक चरम सुर पर पहुंच जाती है. उन्होंने भीड़ को उकसाया. “गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो गांव में श्मशान भी बनना चाहिए,” उन्होंने कहा.

“श्मशान! श्मशान!” मंत्रमुग्ध, भक्त भीड़ में से जवाबी गूंज उठी.

शायद वे अब खुश हों कि भारत के श्मशानों से सामूहिक अंतिम संस्कारों से उठती लपटों की तकलीफदेह तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर आ रही हैं. और कि उनके देश के सारे कब्रिस्तान और श्मशान ढंग से काम कर रहे हैं, अपनी-अपनी आबादियों के सीधे अनुपात में, और अपनी क्षमताओं से कहीं ज्यादा.

“क्या 1.3 अरब आबादी वाले भारत को अलग-थलग किया जा सकता है?” यह रेटरिकनुमा सवाल द वाशिंगटन पोस्ट ने हाल में अपने एक संपादकीय में किया, जो भारत की फैलती जा रही तबाही और नए, तेजी से फैलने वाले कोविड वेरिएंट को राष्ट्रीय सीमाओं में सीमित करने की मुश्किलों के बारे में था. “आसानी से नहीं,” इसका जवाब था. इसकी बहुत कम संभावना है कि यह सवाल ठीक इसी रूप में पूछा गया होता जब कोरोनावायरस महज कुछ महीनों पहले ब्रिटेन और यूरोप में तबाही मचा रहा था. लेकिन भारत में हम लोगों को इसका बुरा मानने का अधिकार बहुत कम है, इसकी वजह हैं इस साल विश्व आर्थिक फोरम में कहे गए हमारे प्रधानमंत्री के शब्द.

मोदी ने एक ऐसे समय भाषण दिया था जब यूरोप और संरा अमेरिका के लोग वैश्विक महामारी की दूसरी लहर के चरम (पीक) की तकलीफ से गुजर रहे थे. प्रधानमंत्री के पास कहने के लिए हमदर्दी का एक शब्द नहीं था, सिर्फ भारत के आधारभूत ढांचे और कोविड संबंधी तैयारियों के बारे में एक लंबी, शेखी से भरी हुई आत्म-संतुष्टि थी. मैंने भाषण को डाउनलोड कर लिया, क्योंकि मुझे डर है कि जब मोदी हुकूमत इतिहास को फिर से लिखेगी, जो जल्दी ही होगा, तो यह भाषण गायब हो सकता है या इसको खोजना मुश्किल हो जाएगा. ये रहीं कुछ बेशकीमती झलकियां:

“साथियो तमाम आशंकाओं के बीच आज मैं आप सभी के सामने 1.3 बिलियन से ज्यादा भारतीयों की तरफ से दुनिया के लिए विश्वास, सकारात्मकता और उम्मीद का संदेश लेकर के आया हूं...भविष्यवाणी की गई थी कि पूरी दुनिया में कोरोना से सबसे प्रभावित देश भारत होगा. कहा गया कि भारत में कोरोना संक्रमण की सुनामी आएगी, किसी ने 700-800 मिलियन भारतीयों को कोरोना होने की बात कही तो किसी ने 2 मिलियन से ज्यादा लोगों की मृत्यु का अंदेशा जताया था.”

“साथियो भारत की सफलता को किसी एक देश की सफलता से आंकना उचित नहीं होगा. जिस देश में विश्व की 18% आबादी रहती हो उस देश ने कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण करके पूरी दुनिया को मानवता को बड़ी त्रासदी से भी बचाया है.”

जादूगर मोदी ने कोरोनावायरस पर प्रभावी नियंत्रण करते हुए मानवता को बचाने के लिए तारीफें बटोरीं. अब जब यह पता चला है कि वे उसे नियंत्रित नहीं कर पाए, तो क्या हम इसकी शिकायत कर सकते हैं कि क्यों हमें ऐसे देखा जा रहा है मानो हम रेडियोएक्टिव हों? कि दूसरे देशों ने सीमाएं बंद कर दी हैं और फ्लाइटें रद्द की जा रही हैं? कि हमें अपने वायरस और अपने प्रधानमंत्री के साथ सीलबंद किया जा रहा है, सारी बीमारी, सारे विज्ञान विरोध, नफरत और बेवकूफी के साथ जिसकी वे, उनकी पार्टी और इस किस्म की राजनीति नुमाइंदगी करती है?

*

पिछले साल जब पहली बार कोविड भारत आया और शांत पड़ गया, तब सरकार और इसके हिमायती जुमलेबाज कामयाबी का जश्न बन रहे थे. “भारत में पिकनिक नहीं हो रही है,” शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया था, जो ऑनलाइन समाचार वेबसाइट द प्रिंट के प्रधान संपादक हैं. “लेकिन हमारी नालियां लाशों से भरी हुई नहीं हैं, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी नहीं है, न ही श्मशानों और कब्रिस्तानों में लकड़ी और जगह की कमी है. यकीन नहीं होता? अगर नहीं मानते तो डाटा ले आइए. सिवाय इसके कि आप सोचते हों कि आप भगवान हैं.” इसकी संवेदनहीन, अशिष्ट ज़ुबान को जाने दें – क्या हमें यह बताने के लिए एक भगवान की जरूरत है कि ज्यादातर महामारियों की एक दूसरी लहर होती है? इस लहर का पूर्वानुमान लगाया गया था, हालांकि इसकी तेज़ी ने वैज्ञानिकों और वायरस विज्ञानियों तक को हैरान कर दिया है. तो कहां है वह कोविड-संबंधी बुनियादी ढांचा और वायरस के खिलाफ “जनता के आंदोलन” जिनकी शेखी मोदी ने अपने भाषण में बघारी थी? अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं हैं. डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ पस्त होने की कगार पर हैं. दोस्त फोन करके ऐसे वार्डों की दास्तान सुनाते हैं जहां कोई स्टाफ नहीं है और जहां जिंदा मरीजों से ज्यादा मुर्दा हैं. लोग अस्पताल के गलियारों में, सड़कों पर या अपने घरों में मर रहे हैं. दिल्ली में श्मशानों के पास लकड़ी खत्म हो गई है. वन विभाग को शहर के पेड़ों को काटने के लिए विशेष अनुमति देनी पड़ी है. हताश-परेशान लोग जो कुछ भी मिल रहा है उससे लाशें जला रहे हैं. पार्कों और कार पार्कों को श्मशान भूमि में तब्दील किया जा रहा है. ऐसा है मानो एक अदृश्य उड़नतश्तरी हमारे आसमान में खड़ी है, और हमारे फेफड़ों की हवा खींच रही है. इस किस्म का एक हवाई हमला जिसको हम कभी नहीं जानते थे.

भारत में बीमारी के एक नए शेयर बाजार में ऑक्सीजन एक नई करेंसी है. वरिष्ठ राजनेता, पत्रकार, वकील – भारत के अभिजात लोग – ट्विटर पर अस्पतालों के बेड और ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए फरियाद कर रहे हैं. सिलिंडरों का एक छुपा हुआ बाजार फल-फूल रहा है. ऑक्सीजन सैचुरेशन मशीनें और दवाएं मिलनी मुश्किल हैं.

बाजार कुछ और चीजों का भी है. मुक्त बाजार की तलहटी में, अपने प्रियजन की एक आखिरी झलक के लिए रिश्वत, जिन्हें अस्पताल के मुर्दाघर में लपेट कर और जमा करके रखा गया है. एक पुरोहित की बढ़ी हुई दक्षिणा जो अंतिम रस्मों के लिए राजी हुआ है. ऑनलाइन मेडिकल सलाहें, जिसमें परेशान परिवारों को बेरहम डॉक्टरों द्वारा लूटा जा रहा है. ऊपरी सिरे की तरफ, एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए आपको अपनी जमीन, अपना घर तक बेचना पड़ सकता है, अपने आखिरी रुपए तक इसमें लगाने पड़ सकते हैं. आपको भर्ती करने पर उनके राजी होने से भी पहले, सिर्फ डिपॉजिट की रकम जुटाने भर में आपका परिवार पीढ़ियों तक पीछे धकेल दिया जा सकता है.

और यह सब उस सदमे, अफरातफरी, और सबसे बढ़ कर उस तौहीनी को पूरा-पूरा बयान नहीं करता है, जिसको लोग भुगत रहे हैं. मेरे एक नौजवान दोस्त टी के साथ जो हुआ वह दिल्ली की सैकड़ों और शायद हजारों ऐसी दास्तानों में से एक है. टी जो अपनी उम्र के तीसरे दशक में हैं, अपने मां-पिता के साथ दिल्ली के बाहर गाजियाबाद में एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं. ये तीनों टेस्ट में कोविड पॉजिटिव पाए गए. उनकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं. चूंकि अभी यह शुरुआती दिनों की बात थी, तो किस्मत से उनकी मां के लिए अस्पताल में एक बेड मिल गया. उनके पिता, जिनमें गंभीर बाइपोलर डिप्रेशन पाया गया है, हिंसक होने लगे और उन्होंने खुद को नुकसान पहुंचाना शुरू किया. उन्होंने सोना बंद कर दिया. वे खुद को गंदा कर लेते. उनकी मनोचिकित्सक उनकी ऑनलाइन मदद करने की कोशिश कर रही थीं, हालांकि वो भी कभी-कभी टूट जातीं क्योंकि उनके पति अभी-अभी कोविड से गुज़रे थे. उन्होंने कहा कि टी के पिता को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत थी, लेकिन चूंकि वे कोविड पॉजिटिव थे तो इसकी कोई संभावना ही नहीं थी. तो टी रात दर रात जागते हुए अपने पिता को शांत करते, गीले कपड़े से उनका शरीर पोंछते, साफ करते. हर बार जब मैंने उनसे बात की मुझे अपनी सांस लड़खड़ाती हुई लगी. आखिर में, मैसेज आया: “पिता गुजर गए.” वे कोविड से नहीं, बल्कि ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ जाने से मरे, जो भारी बेबसी के चलते पैदा हुए मानसिक उथलपुथल का नतीजा था.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


अरुंधति रॉय, https://hindi.newslaundry.com/2021/05/03/coronavirus-pandemic-modi-government-preparation-for-covid-19


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