फैक्ट चैक : कोरोनावायरस लॉकडाउन में मोदी सरकार के दस बड़े झूठ

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published Published on Jun 30, 2020   modified Modified on Jun 30, 2020

-कारवां,

24 मार्च को जब केंद्र सरकार ने नोवेल कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की तो सरकार के प्रतिनिधियों और मंत्रियों ने अपनी राजनीति को सही ठहराने और आलोचना से पल्ला छुड़ाने के लिए जनता के बीच लगातार आधी-अधूरी और झूठी बातें प्रचारित की.

अधिकारियों ने जो दावे किए उनमें से कई जमीनी रिपोर्टों से मेल नहीं खाते. देश के कई हिस्सों में भूख और भुखमरी की हालत देखी जा सकती है और विशेषकर प्रवासी मजदूरों के बीच. अच्छी खासी मात्रा में इन झूठों को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन और प्रवासी मजदूरों को वापिस भेजने में हुए कुप्रबंधन को जायज ठहराने के लिए बोला जा रहा था. भारत के सबसे गरीब लोगों के जीवन को हुई अथाह क्षति और तकलीफों को नजरंदाज किया जाता रहा है.

महामारी के जोखिम में पड़ी आबादी को नजरंदाज कर अधिकारियों ने वायरस के प्रसार पर अंकुश लगाने में सफलता का दावा भी किया. नीचे पिछले तीन महीनों में सरकारी अधिकारियों द्वारा किए गए सबसे गंभीर झूठों की सूची है.

 16 मई के बाद कोविड-19 का कोई नया मामला नहीं होगा

24 अप्रैल को एक प्रेस वार्ता में नीति आयोग के सदस्य और कोविड-19 के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स के चेयरपर्सन विनोद पॉल ने एक स्लाइड प्रस्तुत की जिसमें महत्वाकांक्षी ढंग से दावा किया गया कि 10 मई तक कोरोनावायरस के नए मामलों की संख्या घटकर 1000 से कम रह जाएगी और 16 मई के बाद से भारत में कोई नया मामला नहीं देखेने को मिलेगा. कोविड-19 पर राष्ट्रीय टास्क फोर्स, जिसमें देश भर के 21 प्रमुख वैज्ञानिक शामिल हैं, को महामारी को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया पर नरेन्द्र मोदी सरकार को सलाह देने के लिए बनाई गई थी. प्रेस ब्रीफिंग के तुरंत बाद, प्रेस सूचना ब्यूरो ने पॉल के हवाले से यह कहते हुए गणितीय मॉडल को ट्वीट किया कि, "#COVID मामलों में छिपे हुए स्पाइक से डरने की कोई जरूरत नहीं है, बीमारी नियंत्रण में है." पॉल के मॉडलों ने भविष्यवाणी की कि संक्रमण के मामले एक दिन में अधिकतम सिर्फ 1500 मामलों तक पहुंच पाएंगे. न केवल इस दावे को कोविड-19 प्रतिक्रिया की सलाह देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए एक अन्य सशक्त समूह के कई सदस्यों द्वारा बकवास बताया था और मामलों में निरंतर वृद्धि ने इसे गलत साबित कर दिया है. 16 मई को, भारत में मामले प्रति दिन 5000 की दर से बढ़ने लगे थे और 12 जून तक 10,000 तक पहुंच गए थे.

 भारत में कोविड-19 का सामुदायिक संक्रमण नहीं है

11 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त स्वास्थ्य सचिव, लव अग्रवाल ने कहा, "इसलिए हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम केवल इस स्तर को बनाए रखें और रोकथाम के प्रयासों को बढ़ाएं और यह सुनिश्चित करें कि हम सामुदायिक संक्रमण तक के स्तर पर नहीं जाएं." सरकार के प्रतिनिधियों ने अक्सर इस बात से इनकार किया है कि भारत में सामुदायिक संक्रमण है या इस सवाल से बचते रहे हैं. इससे पहले 14 मार्च को, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, जो भारत की कोविड-19 प्रतिक्रिया का संचालन करने वाली नोडल एजेंसी है के महानिदेशक, बलराम भार्गव ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, “अगर हम 30 दिनों का इंतजाम कर लेते हैं, अगर अगले 30 दिनों में सामुदायिक प्रसारण नहीं होता है, हम अच्छी स्थिति में हो सकते हैं.” इससे संकेत मिला कि भारत में पहले से ही सामुदायिक प्रसारण नहीं था. 2 जून को, आईसीएमआर की एक वरिष्ठ वैज्ञानिक निवेदिता गुप्ता ने महामारी को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामुदायिक प्रसारण के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने सवाल को टाल दिया और कहा, "सामुदायिक प्रसारण शब्द का उपयोग करने के बजाय, प्रसार की सीमा को समझना और अन्य देशों की तुलना में हम कहां खड़े हैं इसे समझना महत्वपूर्ण है.” हाल ही में 12 जून को, भार्गव ने दोहराया कि वे मानते हैं कि भारत में कोविड-19 का कोई सामुदायिक प्रसारण नहीं हुआ है.

भारत में सामुदायिक संक्रमण को खारिज करने की वजह सरकार द्वारा खुद बनाई गई इसकी परिभाषा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थिति रिपोर्ट में मामलों को केवल दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, "केवल आयातित मामले" और "स्थानीय संक्रमण." डब्ल्यूएचओ इटली और स्पेन सहित वायरस के किसी भी केंद्र का "सामुदायिक प्रसारण" के रूप में वर्गीकरण नहीं करता, इन्हें स्थानीय संक्रमण के तहत वर्गीकृत किया गया है. लेकिन सामुदायिक प्रसारण की एक श्रेणी बनाकर और इसे खारिज कर कि भारत में कोविड-19 उस स्तर पर पहुंच गया है, केंद्र सरकार ने प्रभावी ढंग से देश में संक्रमण के स्तर के लिए डब्ल्यूएचओ के वर्गीकरण का खंडन किया है.

मार्च के अंत में, जब छत्तीसगढ़ सरकार ने एक उदार परीक्षण नीति अपनाई, तो उन्हें स्थानीय प्रसारण और सामुदायिक प्रसारण दोनों के प्रमाण मिले. 12 मार्च को ही डब्ल्यूएचओ ने भारत को पहले ही स्थानीय प्रसारण के रूप में वर्गीकृत कर दिया था. एक एके​डमिक जरनल इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक अध्ययन, ने यह भी बताया कि मुंबई में लॉकडाउन से पहले ही सामुदायिक प्रसारण हो चुका था. 25 मई को जन स्वास्थ्य से जुड़े संगठनों, इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन, इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन और इंडियन एसोसिएशन ऑफ एपिडेमियोलॉजिस्ट द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है, “यह उम्मीद करना अवास्तविक है कि कोविड-19 महामारी को समाप्त किया जा सकता है जबकि देश में बड़े पमाने पर या अच्छी खासी आबादी में सामुदायिक प्रसारण पहले से ही हो चुका है. " अब, जब देश में नोवेल कोरोनरी वायरस के 3 लाख से अधिक पुष्टि मामले सामने आ चुके हैं भारत सरकार द्वारा सामुदायिक प्रसारण से लगातार इनकार करना बेतुका है.

 आयुर्वेद और होम्योपैथिक उपचार कोविड-19 को रोकने में मददगार हो सकते हैं

29 जनवरी को आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा और होम्योपैथी के आयुष मंत्रालय ने कोविड-19 की रोकथाम और इसके लक्षणों से निपटने के लिए आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक उपचार के बारे में एक बयान जारी किया. बयान में दिए गए कुछ सुझावों में तुलसी के पत्तों को उबालकर पीना और तिल के तेल की दो बूंदें रोजाना सुबह अपने नाक में डालने की सलाह थी. 21 अप्रैल को, आयुष मंत्रालय ने सरकार के आधिकारिक प्रोटोकॉल में होम्योपैथी को एकीकृत करने की संभावना का पता लगाने के लिए परीक्षणों की शुरुआत की. ?द मिंट अखबार के ऑनलाइन संस्करण, लाइवमिंट के साथ एक साक्षात्कार में आयुष मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान निकाय, सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन होम्योपैथी के महानिदेशक अनिल खुराना ने कहा कि उन्होंने दो अलग-अलग अस्पतालों में परीक्षण किया था. उन्होंने कहा कि जब वे स्पर्शोन्मुख रोगियों पर परीक्षण कर रहे थे, वे अधिक गंभीर लक्षणों वाले रोगियों पर परीक्षण शुरू करने जा रहे थे. चिंताजनक रूप से, केरल, तेलंगाना, पंजाब, उत्तराखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा सहित कई राज्य सरकारों ने नोवेल कोरोनवायरस के लिए आयुर्वेदिक उपचार या निवारक दवाओं का नुस्खा शुरू कर दिया है.

कोविड-19 की रोकथाम में किसी भी तरह से ये उपाय सहायता प्रदान करते हैं या नहीं, इस बारे में अभी तक कोई वैध अध्ययन नहीं हुआ है. ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 225 शोध पत्रों का विस्तृत अध्ययन किया और कहा कि होम्योपैथी की प्रभावकारिता का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है. स्पेन की सरकार ने यह कहते हुए होम्योपैथी पर एकमुश्त प्रतिबंध लगाने पर विचार किया है, कि यह दावा कि इसमें उपचारात्मक या निवारक गुण हैं एक झूठा विज्ञापन है. 2010 में ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन ने अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में होम्योपैथिक उपचार के नुस्खे पर प्रतिबंध लगा दिया और होम्योपैथी को छद्म विज्ञान की संज्ञा दी.

लॉकडाउन के चलते भारत कोविड-19 से बचा रहा है

14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रव्यापी तालाबंदी को बढ़ाने के बारे में देश को संबोधित करते हुए कहा, '' कोरोना वैश्विक महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई बड़ी ताकत और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ रही है. यह आपके संयम, तपस्या और बलिदान की वजह से ही है, भारत अब तक कोरोना के कारण होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर पाया है.” मोदी और सरकार के अन्य प्रतिनिधियों ने लगातार दावा किया है कि नोवेल कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने में लॉकडाउन एक सफलता थी. 22 मई को, नीति आयोग के सदस्य और कोविड-19 के लिए बनी राष्ट्रीय टास्क फोर्स के चेयरपर्सन विनोद पॉल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “प्रधानमंत्री द्वारा तालाबंदी का निर्णय तत्काल ही और ठीक समय लिया गया पर था और जिस तरह से देश ने इसे लागू किया था, एक अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण है. ” उन्होंने कहा, "4 अप्रैल के बाद विकास की गति धीमी हुई है और फिर यह 5.5% पर बंद हुआ. इससे पता चलता है कि देश ने वायरस की प्रगति को रोक दिया ... कुल मिलाकर हमारा औसत 14-29 लाख मामलों और 37000-71000 मौतों के बीच रहा."

हालांकि, कोविड-19 के प्रसार की रोकथाम में लॉकडाउन की सफलता बेहद संदिग्ध है. लॉकडाउन के तीन चरणों की घोषणा में, प्रशासन ने लॉकडाउन की प्रभावशीलता के बारे में सरकार के अपने वैज्ञानिक कार्य बल से परामर्श नहीं किया. टास्क फोर्स के कई सदस्यों ने कहा कि लॉकडाउन भारत के परीक्षण क्षमता और चिकित्सा बुनियादी ढांचे के विकास जैसे महत्वपूर्ण समानांतर उपायों को लेने में सरकार की विफलता के कारण अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में विफल रहा है. 1.3 बिलियन की आबादी को पूर्ण लॉकडाउन के तहत रखने के बावजूद, भारत ने 3 लाख पुष्ट मामले हैं. टास्क फोर्स के सदस्यों ने कहा कि लॉकडाउन विफल हो गया क्योंकि यह एक अवैज्ञानिक समझ पर आधारित था और थियेट्रिक्स (नाट्य प्रस्तुति) की ओर अधिक ध्यान दिया गया था.

डेटा विज्ञान विशेषज्ञों के एक समुदाय, डेटामेट के अध्यक्ष, अंजेश जीएन ने लॉकडाउन के कारण हुई मौतों की संख्या को रिकॉर्ड करने के लिए एक डेटाबेस बनाया, जिसका शीर्षक है, "कोविड-19 गैर-वायरल मौतें". ट्रैकर के अनुसार, भुखमरी और थकावट के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में 178 सहित 742 गैर-वायरल मौतें हुईं. ये मौतें लॉकडाउन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में हुईं.

पूरे तीन महीने हो गए हैं और भूख से एक भी मौत नहीं हुई

14 मई को टाइम्स समूह के बेनेट विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट द्वारा आयोजित एक वैश्विक ऑनलाइन कांफ्रेंस में अपने मुख्य संबोधन में, केंद्रीय रेलवे और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “हमें पूरे तीन महीने हो गए हैं और भूख से एक भी मौत नहीं हुई है. यह सिर्फ केंद्र या राज्य सरकारों का प्रयास नहीं है. यह 130 करोड़ भारतीयों का प्रयास है.” राशन वितरण प्रणाली में विफलताओं, दुकानों तक पहुंच की कमी और फसलों की कटाई में असमर्थता के कारण देश भर से आईं कई रिपोर्टों ने स्पष्ट रूप से भुखमरी की ओर इशारा किया है.

झारखंड और राजस्थान दोनों से ही तालाबंदी के पहले कुछ हफ्तों के दौरान ही भुखमरी और भुखमरी से हुई मौत की जमीनी रिपोर्टों सामने आईं. राष्ट्रव्यापी तालाबंदी के पहले चरण के दौरान दिल्ली से पलायन करने वाले प्रवासी मजदूरों ने संवाददाताओं को बताया कि उनके पास खाना नहीं था. राष्ट्रीय राजधानी में प्रवासी श्रमिकों को खिलाने के लिए काम करने वाले सामुदायिक संगठनों ने उन हजारों प्रवासी श्रमिकों को खिलाने में असमर्थता जताई, जो भूखे थे. ग्रामीण उत्तर प्रदेश की रिपोर्टों में उन परिवारों को भी दिखाया गया है जो राशन और पैसे की कमी के चलते दिन में केवल एक बार खाने को मजबूर थे.

कोविड-19 बगैर-वायरल मौत ट्रैकर के अनुसार, 14 मई से पहले भुखमरी से 23 मौतें हुई थीं. वास्तव में, कई प्रवासियों ने गोयल के खुद के मंत्रालय के तहत चलने वाली ट्रेनों में भोजन तक पहुंच नहीं होने की बात कही. 9 मई से 27 मई के बीच श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में अस्सी मौतें हुई हैं, जिनमें से कई की भूख के कारण होने की भी संभावना हैं.

रेलवे द्वारा मुफ्त में भोजन और पीने का पानी उपलब्ध कराया जाता है

 ट्रेनों में प्रवासी श्रमिकों का उल्लेख करते हुए, 28 मई को भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया, “रेलवे द्वारा मुफ्त में भोजन और पीने का पानी उपलब्ध कराया जाता है. पहला भोजन राज्य सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है. ट्रेन चल पड़ने के बाद रेल मंत्रालय द्वारा भोजन उपलब्ध कराया जाता है. अगर यात्रा कम दूरी की है, तो एक बार और अगर लंबी है तो दो बार भोजन दिया जाता है."

प्रवासी कामगारों पर आई कई रिपोर्टों में लंबी यात्रा में एक से ज्यादा बार भोजन नहीं दिए जाने की बात कही गई है. एक स्वतंत्र रिपोर्टर, साहिल मुरली मेंघानी ने एक ट्वीट में कहा कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन में यात्रा करते समय प्रवासी कामगारों को 78 घंटे से अधिक समय तक भोजन नहीं दिया गया था और ट्रेन के रुकने पर एक खेत में मकई पकाकर खुद के लिए खाने का इंतजाम करना पड़ा था. रेल मंत्रालय की योजनाहीनता का मतलब था कि विशेष श्रमिक ट्रेनें अक्सर 12 घंटे देरी से पहुंचती थीं, और कई बार तो गलत जगह पहुंच जाती हैं, जिससे प्रवासी श्रमिक भोजन, पानी या स्वच्छ शौचालय के बिना फंसे रह जाते.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कई छात्र जो श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में थे, वे भी भोजन और पानी के बिना परेशान हो गए थे. श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में तीन या चार दिनों त​क बिना भोजन—पानी के रहने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार में कई प्रवासी श्रमिकों ने विरोध प्रदर्शन किए. श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में भूख और प्यास से हुई मौतों की भी खबरें आई हैं.

पहले से बीमारियों के कारण ट्रेनों में मौतें हुईं

रेल मंत्रालय ने 29 मई को जारी एक बयान में श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का उल्लेख करते हुए कहा, “यह देखा गया है कि कुछ लोग जो इस सेवा का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें पहले से ही कोई बीमारी है, जो सर्वव्यापी महामारी कोविड-19 के दौरान उनके लिए जोखिम बढ़ा देती हैं. यात्रा करते समय पहले से मौजूद चिकित्सा स्थितियों से संबंधित मौतों के कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मामले हैं.”

27 मई से पहले, हिंदुस्तान टाइम्स ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में 80 लोगों की मौत की सूचना दी, जिसमें मरने वालों की उम्र एक महीने से लेकर 85 साल तक थी. रेलवे सुरक्षा बल ने 1 मई से 8 मई के बीच हुई मौतों का कोई विवरण उपलब्ध नहीं कराया. 8 मई के बाद से डेटा उपलब्ध है और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट की पुष्टि करते हैं. हिंदुस्तान के हवाले से एक जोनल रेलवे अधिकारी ने कहा था, “इन ट्रेनों में यात्रियों को खासतौर पर गर्मी, थकावट और प्यास का सामना सामाना करना पड़ता है. हमने पिछले महीने में ऐसे कई मामले देखे हैं.” कई श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में भोजन और पानी की व्यापक कमी बताई गई थी.

फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट AltNews ने दिल्ली से पटना जाते समय श्रमिक ट्रेन में सवार चार वर्षीय बच्चे के पिता मोहम्मद पिंटू से बात की. मोहम्मद ने कहा कि वे सभी 27 मई को ट्रेन में सवार होने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण करवा चुके थे उन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी. उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान उन्हें केवल एक बार भोजन और पानी दिया गया जिसके चलते बच्चे की मौत हो गई.

27 मई को अपनी मृत मां अरविना खातून को जगाने की कोशिश कर रहे एक बच्चे का परेशान करने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. सरकार के तथ्य-जाँच विभाग, प्रेस सूचना ब्यूरो ने दावा किया कि अरविना जब ट्रेन में सवार हुईं, तब उन्हें कोई बीमारी थीं, और यहाँ तक कि दावा किया गया कि इस बारे में उनके परिवार ने भी स्वीकार किया है. AltNews ने अरविना की बहन से बात की, जिसने कहा कि जब वह ट्रेन में सवार हुई थी तब वह बीमार नहीं थी और यहां तक कि मेडिकल जांच भी हुई थी. अरविना की बहन ने बताया कि यात्रा के दौरान अरविना को पानी की कमी हो गई ​थी. AltNews ने बेंगलुरु स्थित एक सामुदायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सिल्विया कर्पगम से भी बात की, जिन्होंने कहा, "भोजन की कमी के कारण, गर्म मौसम में लंबी यात्रा के कारण आपको निर्जलीकरण होता है. अगर पानी की ठीक व्यवस्था की गई होती तो इससे कई मौतों को रोका जा सकता था. अगर पानी की अच्छी सुविधा होती तो कुछ पहले से ही बीमार और भूखे मरीज़ों को भी बचाया जा सकता था. निर्जलीकरण भुखमरी से अधिक तेज़ी से घातक साबित होता है. "

टेलीग्राफ के एक लेख में एक महीने के शिशु की मौत की सूचना दी गई है जो श्रमिक स्पेशल ट्रेन में गर्मी और पानी की कमी से मर गया. हालांकि, उसी दिन जब रेल मंत्रालय की तरह रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, वीके यादव ने कहा, "मौतों के मामले में, स्थानीय क्षेत्र इनके कारणों की जांच करते हैं और जांच के बिना, आरोप लगते हैं कि मौतें भूख से हुई हैं जबकि भोजन की कोई कमी नहीं. ” यह स्पष्ट नहीं है कि बिना जांच किए रेल मंत्रालय यह निष्कर्ष किस तरह निकाल सकता है कि मौतें पहले से मौजूद बीमारियों के कारण हुईं हैं न कि भूख से नहीं, जिसकी ट्रेनों में सवार प्रवासी कामगारों ने शिकायत की थी.

 कोई प्रवासी सड़क पर नहीं है

31 मार्च को, भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, “मेरे पास राज्य के निर्देश हैं कि अब कोई भी सड़क पर नहीं है. जो भी बाहर था उसे उपलब्ध आश्रयों में ले जाया गया है. ”

यह साफ तौर पर झूठ था. जैसे कि रिपोर्टें आईं कि देश भर में प्रवासी मजदूर 31 मार्च के बाद के हफ्तों तक अपने गांव लौटते रहे थे. उसी दिन इंडियन एक्सप्रेस ने नोएडा से पलामू, झारखंड तक जा रहे प्रवासी मजदूरों के एक समूह का साक्षात्कार लिया. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि समस्तीपुर बिहार जा रहे एक अन्य समूह के साथ मथुरा में पुलिस सवाल—जवाब किए. रिपोर्ट में तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में प्रवासी श्रमिकों के समूहों को रोकने का भी उल्लेख किया गया है. तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में जिस दिन झूठ बोल रहे थे ठीक उसी दिन प्रवासी श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा घर जाने के लिए उमड़ पड़ा क्योंकि सरकार ने पहले कहा था कि ट्रेनें 31 मार्च तक नहीं चलेंगी, उसने दुबारा घोषणा की कि 14 अप्रैल तक ट्रेनें निलंबित रहेंगी.

प्रवासी श्रमिकों के लिए रेलवे 85 प्रतिशत का भुगतान कर रहा है और राज्य सरकारें 15 प्रतिशत की अदायगी कर रही हैं

4 मई को स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव, लव अग्रवाल ने कहा, “विशेष मामलों के लिए राज्यों से दिए गए अनुरोध के आधार पर, विशेष ट्रेनें चलाने की अनुमति दी गई थी. भारत सरकार हो या रेलवे, हमने श्रमिकों से शुल्क लेने की बात नहीं की है. परिवहन लागत का अस्सी-प्रतिशत रेलवे द्वारा वहन किया जाता है, जबकि राज्यों को लागत का 15 प्रतिशत वहन करना पड़ता है. ”

जबकि यह तकनीकी रूप से गलत नहीं है, यह पूरी तरह से गलत धारणा और एक मसखरे तर्क से निर्देशित है. कोई पाठक यह मान सकता है कि इसका मतलब यह है कि प्रवासी कर्मचारियों के टिकट की कीमत पूरी तरह से रेल मंत्रालय द्वारा टिकट की कीमत का 85 प्रतिशत और बाकी भुगतान राज्य सरकार कर रही थी. समाचार वेबसाइट द वायर की जांच में पता चला है कि प्रवासी श्रमिकों को अभी भी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के लिए अपने पूरे टिकट का किराया देना पड़ता है. अग्रवाल ने रेल मंत्रालय की लागत की गणना की थी कि प्रत्येक ट्रेन की नियमित रूप से दो-तरफ़ा यात्रा की तुलना में रेलवे को कितनी राशि का नुकसान होगा और रेलवे द्वारा नियमित रूप से सब्सिडी वाली रेलगाड़ियों की दर पर जोड़ा जाएगा.

स्लीपर श्रेणी के यात्रियों के लिए मानक रेलवे सब्सिडी 47 प्रतिशत है. रेल मंत्रालय प्रवासियों के लिए गाड़ियों पर 85 प्रतिशत की सब्सिडी दे रहा है इसके तर्क के तौर पर अग्रवाल ने आगे कहा कि शारीरिक दूरी के प्रोटोकॉल का पालन करते हुए केवल 1,200 लोगों के ले जा रही श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की अतिरिक्त लागत और लौटते समय खाली लौटने की लागत भी इसमें शामिल है. राज्यों को भी शेष 15 प्रतिशत का भुगतान नहीं करना पड़ता है, उनके राज्य के खजाने से और अक्सर रेल मंत्रालय को भुगतान करने से पहले प्रवासी श्रमिकों से पूरी राशि ली जा रही है, जैसा कि गुजरात से खबरे आईं हैं.

रेल मंत्रालय के एक आंतरिक पत्र में भी स्थानीय और राज्य सरकारों को प्रवासी श्रमिकों से लागत वसूलने और केंद्र की प्रतिपूर्ति करने का निर्देश दिया गया. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख सहित कई राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने बताया है कि जो राज्य प्रवासी श्रमिकों का बोझ नहीं उठाना चाहते हैं, उन्हें केंद्र सरकार से बिना किसी मदद के अपनी टिकट की पूरी लागत का भुगतान करना होगा. द हिंदू ने यह भी बताया कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के किराए में हर यात्रा में स्लीपर टिकटों की नियमित लागत से 50 रुपए अतिरिक्त वसूले गए, जिसका फंसे हुए सभी प्रवासी श्रमिकों को भुगतान करना होता है.

कोविड राहत के लिए 20 लाख करोड़ के सरकारी पैकेज की घोषणा

 13 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “आज जो आर्थिक पैकेज की घोषणा की जा रही है, अगर उसे जोड़ा जाए तो लगभग 20 लाख करोड़ रुपए आते हैं. यह पैकेज भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दस प्रतिशत है. इससे देश के विभिन्न वर्गों और आर्थिक प्रणाली से जुड़े लोगों को 20 लाख करोड़ रुपए की सहायता और शक्ति मिलेगी. ”

समाचार वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट ने एक लेख में मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित किए गए आर्थिक पैकेज की कई कमियों की तरफ इशारा किया है. पैकेज के हिस्से के रूप में घोषित कई योजनाएं या तो कोविड-19 महामारी से पहले ही पाइपलाइन में थीं या वास्तविकता को देखते हुए आर्थिक स्थिति में कोई उत्तेजना पैदा करने के लिए बहुत छोटी थीं.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अहान पेनकर, https://hindi.caravanmagazine.in/politics/fact-check-the-modi-administrations-statements-on-the-lockdown-were-filled-with-misdirections-and-lies-hindi


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